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Showing posts from July, 2025

शंभू की महिमा न्यारी

 विद्या कुंडलियां  विषय शंभू की महिमा न्यारी डम डम डमरू बज रहा ,तांडव करते नाथ देव चिंतित है क्या करे, क्रोधित भोलेनाथ परिभाषा तुम जान ,प्रेम भगवन से सिखा भूले बिसरे गीत, प्रेम की गाथा लिखा शिव शंकर का प्रेम,पार्वती जिस पर वारी मां गौरी के नाथ ,शंभू की महिमा न्यारी Suraj Tiwari

कृष्ण सदा लड़ते है वार

 विद्या _वीर छंद काव्यांश कृष्ण सदा लड़ते है वार बैठे बैठे सोच रहे क्या,जीवन की उपलब्धि आज  करके खाओ कहता है जग ,बिना कर्म मिले ना अनाज जीवन के रंग अनेकों है,हमने सीखा इतना यार  प्यार अधूरा राधा का भी,कृष्ण सदा लड़ते है वार Suraj Tiwari

बचपन के खेल

 विद्या सार छंद विषय बचपन के खेल खेल खिलौने बचपन वाले,याद कभी जब आते  उन बच्चों को देखूं अक्सर ,जो स्कूल नहीं जाते मात पिता की डाट सुने फिर,भी देखो मुस्काते  बाग, बगीचों ,खलिहानों में,गीत प्यार के गाते आज वहीं गांव गली छोड़े,सब कुछ जाते खोते  लड़का होना बहुत कठिन है, परदेश चले रोते  Suraj Tiwari

राघव राम पधारे

 विद्या __सार छंद काव्यांश _राघव राम पधारे *भक्ति भाव से प्रभु राहों में* , वह तो फूल बिछाती  ऋषि मुनि भी अब शीश छुकाते, वह प्रभु को समझाती  मेरे कुटिया को पावन कर ,झूठा तुम्हें खिलाती *बड़ी अभागन हूँ मैं* रघुवर, *शबरी* चरण दबाती *मंद *-* मंद प्रभु* मुस्काते *हैं* अब दुख नहीं जताते मां हनुमत से मिलना चाहूं,सारी कथा सुनाते  सब ऋषिमुक पर्वत पर  रहते ,बाली के डर से भागे राज पाठ को त्यागा सुग्रीव,जो है बड़े अभागे परलोक मुझे भी जाना है ,समय नहीं कहने को आज्ञा पा शबरी रघुवर से, चली धाम रहने को शबरी ने छुआ चरण राघव के  , पर प्रभु दुष्टों को मारे, हृदय सुखद इठलाता है घर, राघव राम पधारे  Suraj Tiwari

प्रधान रहा

 दुर्मिल सवैया छंद वह मानव क्या बतला सकता जिसके मन में अब घाव रहा वह रो कर जीवन को समझा,हसना जिसका स्वभाव रहा   सर पे पगड़ी फिर शोभित हो ,वह देख बना एक छांव रहा अब करते हम याद प्रधान तुम्हें तुमसे दिख सुंदर गांव रहा         Suraj Tiwari

सावन मन भावन

 सरसी छंद  💚🟢सावन मन भावन🟢💚  बाबू जी कहते है सावन, सबसे प्यारा मान हरियाली छाई चहूं ओर  धरती सजती है जान  सावन पावन है जल भर के, कावड़िया ले आय हर हर बम बम का नारा ही, शिव शंकर को भाय मेढक कूद रहे आस पास करते‌‍ टर टर पास बारिश होगी मूसलाधार मेढक पर विश्वास बारिश से जी डरता है अब, सुख से बीते रात अम्बर में बिजली तड़की है  प्रभु कम हो बरसात कागज की कस्ती वो मस्ती, करते कितना शाद मन झूम रहा खुशी से देख, आता बचपन याद प्यारा प्यारा जीवन जिनका करते हर दम गान  देख किसानों को जो जल में  गोद रहे है धान कवि भेज रहा सावन में खत, प्रिय से मिलने की चाह ताजमहल को देखा जब से, दिल से निकले वाह Suraj Tiwari

रक्षाबंधन का त्यौहार

 सरसी छंद  16.11यति पदांत 21 🔆रक्षाबंधन का त्यौहार 🔆 देख कलेंडर में इस दिन का,करते रहते वार  देख रक्षाबंधन है भाई,बहनों का त्यौहार  इस दिन सुबह सुबह होता है,मानो सबसे खास भाई बहना रहते देखो,अपने बैठे पास बहनों की थाली सजती है,बनता फिर है जाल मम्मी पापा देख रहे है,क्या होगा अब चाल हाथ बधी राखी पर खुश थे,चहरे पे मुस्कान बहना को दे क्या अब भाई,रक्षा करेगा मान डाला हाथ जेब से निकला,सौ का जब अब नोट  चिल्लाई बहना कहती है,भैया मन में खोट Suraj Tiwari

खेल खिलौने जीवन का हिस्सा (मुक्तक)

 पापा ने जो उपहार दिया,देख उसे मुस्काता हूं साईकिल गली गली लेकर, पापा के गुण गाता हूं बच्चों से बचपन ना छीने,लोगों से कहते रहते है खेल खिलौने है जीवन का,हिस्सा देख बताता हूं Suraj Tiwari

बस मांगू अधिकार

 सरसी छंद  16.11  पदांत 21 शाम सबेरे जब जी करता,करते दिल की बात  मुलाकात कर कहना था,सोच रही क्या जात हम तेरे अपने है देखो ,दिल की नाजुक डोर मिलना आसान कहां वर पक्ष ,जब प्रभु देते जोर घर वाले थक जाएंगे जब,तब आओगे पास  दीपक ले ढूंढोगे सूरज,मिले तभी विश्वास जीवन पथ पर कठिनाई है,हाथ थाम लो यार प्यार तुम्हें भी हो जाएगा,मिले तुम्हे उपहार भगवन से करता प्रार्थना ,विनती बारम्बार तुम मेरी हो जाओ इतना,बस मांगू अधिकार Suraj Tiwari

जब थे अपने गांव

सरसी छंद  16.11यति पदांत 21    जब थे अपने गांव 1गांवों में रोजगार नहीं है    घबराकर मत भाग आज नहीं क्या गांवों में है , थोड़ा सा गर जाग  2.जीवन में पैसे उपयोगी , करना चाहे नाम मजबूरी है तो कौशल सिख , घर से ही कर काम 3.गाँव गली से क्यों रिश्ता तोड़ा,  तू ना अब मुंह मोड़  शिक्षा चिकित्सा सब है देखो,  फिर जाता क्यों छोड़ 4.लोग मिलें शहरों में देखो, बचपन करते याद परदेशी मिलते थे जब भी, दिल करता था शाद  5.शहरी लोगों से मिलते थे , जिनका यु बुरा हाल  कहते हम तरकारी बेचो, बचा लो अपनी खाल 6.बात पते की कहता सुन लो, चलों यु उल्टे पांव क्या याद तुम्हें है अब बोलो, पीपल का वह छांव   7.बैठ कभी करते थे चर्चा, क्यों खाते हो भाव कितना मौज उड़ाते थे तुम, जब थे अपने गांव  Suraj Tiwari

कितना प्यारा गांव हमारा

 1.हरे भरे सुंदर वन उपवन ,से सजा हुआ प्यारा गाँव। प्यारे प्यारे लोग यहां के, बैठे पीपल के हम छांव।। 2.गांव गली घर छूटा जैसे, खुशियों से देख हुए दूर। घर का चूल्हा मां की रोटी,खाने को अब है मजबूर।। 3.सावन की बूंदे धरती पर,गिर कहती अक्सर यह बात। ना अलग करो मैं पानी हूं ,मेरी भी  है अब औकात।। 4.बने मुसाफिर बन छोड़ चलें,देखो अपने अपने राम।  वनवास बिता करते है अब, सपनो के लिए यहां काम।। 5.जीवन के रंग अनेकों है ,हमने सीखा इतना ज्ञान । जीवन जीया कम लेकिन था,इतना चारों तरफा शान।। 6.लोग हमें देते है ताने,करते कानाफूसी आज । जब अखबारों में छपते थे, बहुतों के आता था काज।। 7.जीवन हार नहीं मानेंगे,मेरी बातों को भी मान।  गिर गिर खुद खड़ा हुआ जैसे ,मुझमें दीपक को तू जान।।  Suraj Tiwari

अभिमन्यु वध

अभिमन्यु कीड़ा स्थल नहीं यह मृत्यु निकट जब आया है ।  दुर्योधन कहता रूक  बालक काल तेरा आया ।। द्रौण, कृपा, भीष्म, कर्ण शकुनि   सब जाने हैं।  निहत्थे अभिमन्यु पर सारे तलवारे ताने है ।। धिक्कार है उन योद्धाओं पर जो षड्यंत्रों से जीते हैं ।  उन्हें तरस ना आया बिल्कुल वह संबंधों से रीते है।। सात-सात योद्धाओं ने मिलकर अभिमन्यु को मारा है ।  अर्जुन जान पुत्रघात जयद्रथ वध ऊच्चारा है।।  सांझ का भ्रम जयद्रथ जब  निकल सूर्य आया। प्रण पूर्ण किया अर्जुन ने गांडीव लहराया।। प्रण पूर्ण किया अर्जुन ने जयद्रथ को मारा है ।  यह रचा खेल श्री कृष्ण ने दुखियों का जो सहारा है।।  धृतराष्ट्र के पुत्र मोह ने यह संग्राम रचाया है।  केशव के समझाने पर भी जब वह समझन पाया है।।  पुत्र मोह नहीं होता तो चीरहरण नहीं होता।  भीष्म पितामह जैसा योध्दा तीरों पर नहीं होता।। Suraj Tiwari 

खत में लिखता हूं सब राज

आल्हा छंद 16.15यति.पदांत 21 छोड़ कहां जा सकता हूं प्रिय, क्यों हो मुझसे तुम नाराज प्यार अधूरा कब जी सकता,खत में लिखता हूं सब राज याद कभी तुमको जब कर के, लिखता रहता खत मै यार सोच समझ कर घर पर आता,करना चाह रहा इजहार बारिश की बूंदों में करते ,यारा तुमको दिल से याद आंखों में अब जल भर आया ,मुश्किल से दिल करता शाद जज्बात लिखूं मै तो दिल की,प्यार करूं क्यों तोडूं फूल  मुफलिस की अब हवा चली है,आंखों में गड़ते अब शूल राहत कब मिलता है दिल को ,करते हम फूलों से प्यार नाजुक कलियों में कांटे फिर,भी गुत्था मोती का हार  जब भवरों ने कहना चाहा,फूलों से अब दिल की बात  समझाया कांटों ने भवरे ,करते सीधा दिल पर घात Suraj Tiwari

विधाता छंद

सिपाही की कहानी अब सुनाकर रो रहे हम हैं। तिरंगे से लिपट के शान से अब जा रहा कम हैं ।। मिटा कर दुश्मनों के हौसले को चूर कर डाला। न पूछो जाति अब रणबाकुरों से था पड़ा पाला।। Suraj Tiwari

विधाता छंद

 विधाता छंद  बिका घर बार बेटा बाप के तरफा इशारा है। पिता सोचे हमारे बाद बेटा अब  सहारा है।। पिता भरपूर देखो साथ देता बस कमाना है। पिता मजबूर है अब साथ बेटे को निभाना है ।। Suraj Tiwari