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ग़ज़ल

 उसे दिखता तिरा ही अक़्श तेरी हर निशानी में इसी से ज़िक्र करती श्याम का राधा कहानी में// जरूरत है कि बदले हम बुरी आदत को अब अपनी  ख़ताएँ हो ही जाती है सभी से अक्सर जवानी में// बढ़ाकर फासले तुमने किया आधा मुझे मोहन , तभी होती विकल है राधिका प्यारी नादानी में // सजे महफिल फ़लक पर रोज चंदा और तारों की  मगर यह देखता इंसान कब बोलो जवानी में//  तेरे किरदार से वाकिफ़ ज़माना हो चुका है  वहम लेकिन दिखाई दे रहा तेरी जुबानी में// लगाकर टकटकी देखे ज़मीॅं को जब कभी सूरज  नज़ारा खूबसूरत देखता दरिया के पानी में// सूरज तिवारी 

ग़ज़ल

बाप के हरिक विरासत को बढ़ाऊं कैसे छोड़ के घर शहर को आज मैं जाऊं कैसे खाक होते हुए दिखा आज जो जिंदा दिल था शख़्स तो शेर था इसको यूं जगाऊं कैसे  जब अदालत में बिके न्याय खुलेआम यहाँ फिर मैं कातिल को सज़ा आज दिलाऊँ कैसे   खौफ़ बेतरह बढ़ा तीरगी का अब देखो मैं दिया रोज न आखिर मैं जलाऊँ कैसे झूठ करता है जो बे आब हमेशा सच को रूह में में आग लगी है ये बुझाऊं कैसे  सूरज तिवारी