ग़ज़ल
दिल में अब आरजू जगाया कर ग़म मिलें फिर भी मुस्कुराया कर लाल इतनी हुई है क्यों ऑंखें अश्क़ चश्मे से तू छिपाया कर कैद कर प्रेमियों के जोड़े को ऐ सितमगर सितम न ढाया कर भेद देने से जल गई लंका भेदियों से बसर बचाया कर देन मॉं बाप की विरासत है बेच कर दाग मत लगाया कर सूरज तिवारी