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Showing posts from January, 2026

दोहा मुक्तक

सखा विरह कैसे सहा,तुम जानो सब नाथ पड़ा चरण हूं आपके ,मुझपे रखना हाथ  भक्ति भाव मेरा समझ,बोलो कृपा निधान  सुदामा कृष्ण द्वार पे , माँग रहा है साथ सूरज तिवारी

ग़ज़ल

फ़िज़ूल का मेरे घर खर्च देख जान रहे नहीं रखे है कमाई पिता जी मान रहे कभी न रूठ के भगवान द्वार से जाए  ये सोच कर के पिता मुफलिसों दे दान‌ रहे    खुदा वतन के लिए बस ईमान हो उर में   बुजुर्ग की है विरासत हमें ये ध्यान रहे सभी हैं चाहते बस तख्त वो ताज दुनिया में बने फकीर हो तुम क्यों ये हम भी जान रहे शिकार कर ने चलें शेर खाल पहने हुए    यहां परिंदे सभी अब गगन को छान रहे सूरज तिवारी

चेतना छंद 2212,2212

 है बंदगी ,ये जिंदगी  हम थे जलें ,जिस पथ चलें कैसा डगर,हमको ख़बर जो बट रहे, वे कट रहे  क्या हम नहीं, हिन्दू सही क्या मान गर,सामान्य गर  बोलो सखा,क्या है रखा बेकार ये,सरकार ये कैसा बजट,ये है गजट  अब साफ कर,मत माफ कर सब वार कर,मन मार कर अब भाजपा , लगता नपा आए शरण,तेरे चरण  दे प्राण सब,हे राम अब अब मान दो ,बस ज्ञान दो प्रभु तार दो ,बस प्यार दो  सूरज तिवारी 

जंग और दिल्लगी

 यहाँ जीना भले भारी बहुत है,  मगर यह ज़िंदगी प्यारी बहुत है  निभाए कौन बोलो साथ तेरा  हर सू कालाबाजारी बहुत है  उसी रस्ते पर अब तुम जा रहे क्यों,  कहे फिरते थे व्यापारी बहुत है  दिए बिन जह्र मारती ज़िंदगी है  तभी देती है बीमारी बहुत है  हो जारी जंग या फिर दिललगी हो,  जगह हर मारामारी बहुत है सूरज तिवारी 

जिंदगी की सियासत

 यहां राजा के दरबारी बहुत है  मरें क्यों जिंदगी प्यारी बहुत है   जहां में साथ कोई भी न देगा  यहां पर काला बाजारी बहुत है कमाते फिर रहे हो चंद रुपए कभी हँसते थे व्यापारी बहुत है दगा देती सभी को जिंदगी है   सनम मुझको भी बीमारी बहुत है यहां तो जंग के मैदान में भी अभी देखो वफादारी बहुत है सूरज तिवारी

पतंग और डोर

पतंगे आसमां को छू रही खुशहाल बच्चा है अधूरे डोर को पकड़े कहें रिश्ता यूं कच्चा है   मकरसंक्रांति की शुभकामनाएं दे रहे सबको  दिलों में प्यार का उमड़ा जो सैलाब सच्चा है सूरज तिवारी

ग़ज़ल

 सभी की नैय्या वो ही देखो खेता है  खुदा बिन मांगे सब कुछ यार देता है  भरा था मुफलिसी में पेट बच्चे ने  उसे अब तो कोई भी गोद लेता हैं किया कुर्बान सब कुछ ही जहां के वास्ते बगावत कर उभरता था वो नेता हैं  सूरज तिवारी

ग़ज़ल

हुई जवानी ख़त्म मिरी दिल लगाते हुए  मगर वो साथ दे हम नाचे मुस्कुराते हुए हमारे पास आ कोई पिता का दर्द समझे विदाई पे तेरे बेटी विरह सुनाते हुए परिंदे छोड़ कहां जाएगा तू आशियाना शिकारी पेड़ को यूंही देख जलाते हुए नसीबो में जो लिखा है मिलेगा वो प्यारे किसी की बात का मजाक क्यों उड़ाते हुए फिजूल शौख न पालों जहां में अब सूरज अधूरे प्यार को क्यों तुम सनम जलाते हुए सूरज तिवारी

ग़ज़ल

 ग़ज़ल वे बेझिझक ही सभी का जवाब लिखने लगे हुए बड़े तो सबका हिसाब लिखने लगे गुनाह कोई भी छोटा बड़ा नहीं होता ये सोच हम्म  भी पुख़्ता किताब लिखने लगे चराग़ घर का तो सरहद पे हो गया कुर्बां करे जो जुर्म उनको खराब लिखने लगे उबाल आए जो खूं में तभी सही रहता  नदी के पाक से जल को शराब लिखने लगे फ़िज़ूल खर्च तो छोड़ो सुनो ऐ सूरज तुम अज़ीज़ तेरे तुझे अब नवाब लिखने लगे  सूरज तिवारी

सरसी मुक्तक

 सरसी मुक्तक  जीवन में हो कोई उलझन,                       कहते दिल को खोल। भगवन अपनो के खातिर ही                                            करते है हम झोल।।                     फिर भी हम अपनो से हारे ,                        करके थोड़ा चूक। भीष्म पितामह की तरह यहां,                          बिके सदा बेमौल।। सूरज तिवारी

मुक्तक

कभी रिश्ता निभाते है कभी फिर दूर होते है यहां सपने सभी पल भर में चकनाचूर होते है परीक्षा ले रही दुनियां हमारी हर घड़ी सच है  खुदा हम द्वार तेरे यूं खड़े मजबूर होते है सूरज तिवारी