पुंडरीक छंद 16,8 पदांत 122 नैनो से नीर बहे कान्हा , ढलें जवानी प्रेम अधूरा ही रहता है,सुनी कहानी मां मुख खोले तो सूर्य चंद , ब्रह्मांड दिखे नंद यशोदा का लाल सुनो,इतिहास लिखे कान्हा छल करता छलिया है,क्यों नादानी प्रेम अधूरा ही रहता है ,सुनी कहानी कृष्ण गए क्यों छोड़ गोपियां,जीना पाए गोकुल के वासी राह तके,व्यथा सुनाए ग्वालों के संग रार करे,तू मनमानी प्रेम अधूरा ही रहता है ,सुनी कहानी तुम बिन जीवन जीना मुश्किल ,किससे कहते प्रभु तुमसे ही आस हमारी ,दुख को हरते धर्म संग खड़े रहे कौरव,थे अभिमानी प्रेम अधूरा ही रहता है, सुनी कहानी युद्ध तुम्हारे वश में फिर क्यों,खेल खिलाया केशव भाई को भाई से ,नहीं मिलाया कुरूक्षेत्र में श्राप ग्रहण कर , हंसते दानी प्रेम अधूरा ही रहता है,सुनी कहानी पग पग पर पांडव जलते है, शकुनी छलते है अपराध हुआ धर्मराज से हाथ ,वो भी मलते पांचाली का कष्ट आँख से,बहता पानी प्रेम अधूरा ही रहता है,सुनी कहानी नदी किनारे अब भी बैठी,राह निहारे श्याम मिलन आस में राधा, तुम्हें पुकारे आंखों से छलक रहे आंसू ,राधा रानी प्रेम अधूरा ही रहता है,सुनी कहानी सूरज तिवारी