राघव राम पधारे
विद्या __सार छंद
काव्यांश _राघव राम पधारे
*भक्ति भाव से प्रभु राहों में* , वह तो फूल बिछाती
ऋषि मुनि भी अब शीश छुकाते, वह प्रभु को समझाती
मेरे कुटिया को पावन कर ,झूठा तुम्हें खिलाती
*बड़ी अभागन हूँ मैं* रघुवर, *शबरी* चरण दबाती
*मंद *-* मंद प्रभु* मुस्काते *हैं* अब दुख नहीं जताते
मां हनुमत से मिलना चाहूं,सारी कथा सुनाते
सब ऋषिमुक पर्वत पर रहते ,बाली के डर से भागे
राज पाठ को त्यागा सुग्रीव,जो है बड़े अभागे
परलोक मुझे भी जाना है ,समय नहीं कहने को
आज्ञा पा शबरी रघुवर से, चली धाम रहने को
शबरी ने छुआ चरण राघव के , पर प्रभु दुष्टों को मारे,
हृदय सुखद इठलाता है घर, राघव राम पधारे
Suraj Tiwari
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