57.किरीट सवैया (पूछ रहे जन से हम)
समीक्षार्थ किरीट सवैया 211*8 पूछ रहे जन से हम है धन क्यों फिर इनकार करें अब जीवन में कुछ लोग कमा कर के घर का उपकार करें कब मालिक देख बिछाकर आंचल मांग रहा जिसके हम है सब है अब से कहना जग में न निराश हमें रहना दर पे रब Suraj Tiwari