जुगनू प्रश्न उठाते थे झूठी कसमें खाते थे सूरज है नादान बड़ा तुम जग को बतलाते थे ग़म के काले साये में यू मुझे ग्रहण लगाते थे चाँद सितारों की कसमें प्रेमी नहीं निभाते थे सूरज पर प्रश्न उठाकर घर को रोशन करते थे सूरज तिवारी
ग़ज़ल बाप के हरिक विरासत को बढ़ाऊं कैसे छोड़ के घर शहर को आज मैं जाऊं कैसे खाक होते हुए दिखा आज जो जिंदा दिल था शख़्स तो शेर था इसको यूं जगाऊं कैसे जब अदालत में बिके न्याय खुलेआम यहाँ फिर मैं कातिल को सज़ा आज दिलाऊँ कैसे खौफ़ बेतरह बढ़ा तीरगी का अब देखो मैं दिया रोज न आखिर मैं जलाऊँ कैसे झूठ करता है जो बे आब हमेशा सच को रूह में में आग लगी है ये बुझाऊं कैसे सूरज तिवारी
ग़ज़ल वो लड़की जा रही बर्बाद करके पुरानी दोस्ती आबाद कर के बहुत खुश थे कभी हम साथ तेरे मरे जाते हैं अब फरियाद कर के सभी होंगे फना दुनिया से इक दिन तो रोना क्यों किसी को याद कर के सूरज तिवारी
ग़ज़ल कुछ इस तरह से खुद को सॅंवारा कभी कभी यादों में तेरे खुद को निखारा कभी कभी खुशियों के फूल खिल गए वीरान चमन में उसने किया हमें जो इशारा कभी कभी खा कर भी चोट खुद ही सॅंभलना पड़े यहॉं मुश्किल से कोई देता सहारा कभी कभी करते हैं जॉं निछावर हम पर कई मगर हमने तो बस तुझे ही पुकारा कभी कभी इकरार हो न हो कोई ग़म अब हमें नज़रें उठा के देख तो यारा कभी कभी सूरज तिवारी @highlight