फरेबी थे मगर देता हूं अब उपहार तुमको भी नहीं दुश्मन नहीं हो तुम करेंगे प्यार तुमको भी गिले शिकवे मिटा कर जंग जीता है जमाने से नए इस साल में अपना कहेंगे यार तुमको भी सूरज तिवारी
ग़ज़ल उर्मिला रो रही लखन के प्यार में, रोज़ बैठे बिछा नयन इंतजार में। रोज करती दुआएं वो रब से यही, रब दुबारा न आऊं मैं संसार में। दिल में चाहत लिए जागती रात भर कट रही उम्र उसकी अब ख़ार में। प्रीति की रीत होती अनोखी बड़ी, लुत्फ़ आता बहुत है यहाँ हार में। नींद आंखों की मेरी उड़ी आजकल, दिल करे कूद जाऊॅं मैं अंगार में। सूरज तिवारी
शिकारी को समझ अब खग गए हैं, बिछा जब जाल देखा भग गए हैं। बहन ने भाइयों से राज खोला, घरों में आज दीमक लग गए हैं। जुदा हो बाँह से मिलता नहीं कुछ, विभीषण जीत कर भी ठग गए हैं। सूरज तिवारी
समाज के प्रपंचों में जली है, अहिल्या प्राण अर्पण कर चली है। हमारे बाद पूजेगी ये दुनिया, अवध के वासियों, सीता भली है। लगा है चोट रघुवर को जहान में, ये बातें पत्थरों को भी खली हैं। बना है प्रेम-निर्मित पुल जहाँ में, मिटेंगे धूल में, रावण में खलबली है। किया अत्याचार तो ये देख लेना, यहाँ रावण की नगरी भी ढली है। सूरज तिवारी
ग़ज़ल दिया जो श्राप मां ने जग गया है अधूरे कृष्ण को अब लग गया है सुदामा मित्र से मिलने कन्हैया भवन से ग्राम नंगे पग गया है जिसे दुनिया समझती देवता है वही छलिया जगत को ठग गया है सूरज तिवारी
अधूरे प्यार को नाराज समझा बनें एक मकबरे को ताज समझा जमानेंं में जलें है और भी दिल हवाएं जब चलीं तो राज समझा गुजरती जा रही है जिंदगी अब घड़ी की सुईयों का काज समझा बदलते जा रहे दोस्त मेरे जहाँ की भीड़ ने आवाज़ समझा मरें हैं प्रेमिका की चौखटो पर कई प्रेमी जिन्हें मै आज समझा सूरज तिवारी
राम को देखकर मुस्कुराती रही। जानकी वाटिका में लजाती रही। मानती थी जिन्हें प्रेम का देवता , जानकी फूल उनको चढ़ाती रही। राम भाए नजर बस चुराती रही, जानकी ख़्वाब मन में सजाती रही। हो धनुष भंग बस राम के हाथ से, वह महादेव से हित मनाती रही। चाहती थी जिन्हें पास अपने सदा, पा लिया राम वर मुस्कुराती रही । छोड़ महलों भरा सुख वनों में रही, राम का साथ हर पल निभाती रही। मीत कैसे भूला दे तुम्हें इस तरह, राम के इस हृदय में समाती रही । सूरज तिवारी