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Showing posts from November, 2025

ग़ज़ल

 ग़ज़ल  करेंगे कुछ बड़ा डट कर अड़े है अकेले भीड़ से हट कर खड़े है नहीं कोई गिला मुझको खुदा से जहां में जंग सूरज भी लड़े है  शिकायत जिंदगी से अब रही ना  यहां कुछ लोग बिस्तर पर पड़े है सूरज तिवारी

ग़ज़ल

 गए मोहन कमी सबको खली है अकेले राह बैठी बावली है  न पुरुषार्थ कभी आंका मुरारी जगत में बावली राधा जली है किया किसका नहीं उद्धार राधे जहां में प्रेम की सीधी गली है बजाते चैन की बंसी कन्हैया  कभी ये बावली पीछे चली है न छोड़ो बीच राहों में कन्हैया किसी के बाग की नाजुक कली है - सूरज तिवारी

ग़ज़ल

 हमारे पांव के जूते किधर है बुराई आज वो करते खबर है   चिरागों से जलें है हाथ मेरे  हवा जिस और का वो उधर है मिलेगा वोट किसको जानता हूं हमारी चाहते सब बेअसर है बदलते वक्त को क्या देखते हम छुपाया यार ने खंजर नजर है भला करना जमाने का गलत है खड़े उस राह पर बागी जिधर है  सूरज तिवारी

कविता

कविता  धनुष को भंग कर भाते मिले है सिया के संग प्रभु आते मिले है अयोध्या में सभी उत्सव मनाते खड़ाऊ अब भरत लाते मिले है मिला कब प्रेम रघुवर को जहां में सिया का पीर हम गाते मिले है  हमारे राम निर्माता जगत के जगत के चोट को खाते मिले है दिया आदेश तो लंका जली है किया कुछ भी न समझाते मिले है बड़ा है नाम राघव का जगत में बुराई खत्म कर जाते मिले है मुसाफिर जिंदगी से तुम न थकना  जहां में राम मुस्काते मिले है सूरज तिवारी