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Showing posts from July, 2026

गीत

पुंडरीक छंद 16,8 पदांत 122 गुरुवर परिमार्जित करते है,ज्ञान हमारे सभी शिक्षक गण बच्चों का तो ,भविष्य सँवारें गुरुवर अनुशासन में रहना,हमें सिखाते सत्कार बड़ों का करना अब,हमें बताते जीवन के विषम समय में भी,बने सहारे सभी शिक्षक गण बच्चों का तो ,भविष्य सँवारें जीवन में पग-पग से अवगत,हमें कराते मेरी नादानी पर अक्सर,वो मुस्काते गुरुदेव भाग्य आप बनाते,सब से न्यारे सभी शिक्षक गण बच्चों का तो ,भविष्य सँवारें गुरु के चरणों में नित्य रहे,चरण दबाए सभी प्राणियों पर दया करें,हमें सिखाए आसमान में चमके बन कर,हम ध्रुव तारे सभी शिक्षक गण बच्चों का तो ,भविष्य सँवारें सूरज तिवारी

गीत

पुंडरीक छंद 16,8 पदांत 122 नैनो से नीर बहे कान्हा , ढलें जवानी  प्रेम अधूरा ही रहता है,सुनी कहानी मां मुख खोले तो सूर्य चंद , ब्रह्मांड दिखे नंद यशोदा का लाल सुनो,इतिहास लिखे कान्हा छल करता छलिया है,क्यों नादानी प्रेम अधूरा ही रहता है ,सुनी कहानी कृष्ण गए क्यों छोड़ गोपियां,जीना पाए गोकुल के वासी राह तके,व्यथा सुनाए ग्वालों के संग रार करे,तू मनमानी प्रेम अधूरा ही रहता है ,सुनी कहानी तुम बिन जीवन जीना मुश्किल ,किससे कहते प्रभु तुमसे ही आस हमारी ,दुख को हरते धर्म संग खड़े रहे कौरव,थे अभिमानी प्रेम अधूरा ही रहता है, सुनी कहानी युद्ध तुम्हारे वश में फिर क्यों,खेल खिलाया केशव भाई को भाई से ,नहीं मिलाया  कुरूक्षेत्र में श्राप ग्रहण कर , हंसते दानी  प्रेम अधूरा ही रहता है,सुनी कहानी पग पग पर पांडव जलते है, शकुनी छलते है अपराध हुआ धर्मराज से हाथ ,वो भी मलते पांचाली का कष्ट आँख से,बहता पानी प्रेम अधूरा ही रहता है,सुनी कहानी नदी किनारे अब भी बैठी,राह निहारे श्याम मिलन आस में राधा, तुम्हें पुकारे आंखों से छलक रहे आंसू ,राधा रानी  प्रेम अधूरा ही रहता है,सुनी कहानी सूरज तिवारी

ग़ज़ल

 ग़ज़ल  कुछ इस तरह से खुद को सॅंवारा कभी कभी यादों में तेरे खुद को निखारा कभी कभी खुशियों के फूल खिल गए वीरान चमन में उसने किया हमें जो इशारा कभी कभी  खा कर भी चोट खुद ही सॅंभलना पड़े यहॉं मुश्किल  से कोई देता सहारा कभी कभी करते हैं जॉं निछावर हम पर कई मगर हमने तो बस तुझे ही पुकारा कभी कभी इकरार हो न हो कोई ग़म अब हमें नज़रें उठा के देख तो यारा कभी कभी सूरज तिवारी @highlight

ग़ज़ल

 ग़ज़ल  जिस के लिए खड़ा हूं मैं सागर लिए हुए  मेरी  तलाश करता है खंजर लिए हुए  तूफान ए ज़ुल्म व जौर से टकरा गया हूं मैं  होठों पे तिशनगी का समुन्दर लिए हुए  अहले खिरद ज़माना जिसे कह रहा है आज वो ही खड़ा है हाथ में पत्थर लिए हुए  जिसका वजूद कुछ नहीं नजरों के सामने  पत्थर की शक्ल में हैं वो गौहर लिए हुए   अय बादशाहो तुम ये सबक भूलते हो क्यों   दुनिया से क्या गया है सिकंदर लिए हुए  सूरज तिवारी

ग़ज़ल

 ग़ज़ल वक्त के साथ जो भी चलते हैं  अपने हालात को बदलते हैं  अपने घर से वो जब निकलते हैं  अहले दिल अपना हाथ मलते हैं कामयाबी कदम न चूमे क्यों ठोकरें खा के जो संभलते हैं  उनको भी कामयाब कर मौला जो मुझे देख करके जलते हैं  जब से रोशन हुआ हैं ये सूरज कितनी नजरों को आज खलते हैं सूरज तिवारी

गीत लेखन विद्या

 गीत की अलंकारिक परिभाषा--- गीत किसी उद्दीपित भाव की एक मर्यादित अविरल धारा है, मुखड़ा जिसका उद्गम है, अंतरे जिसके मनोरम घाट हैं, पूरक पद जिसके तटबन्ध हैं और समापन जिसका अनंत सागर में विलय है। गीत के छः शैल्पिक लक्षण है- (1) मुखड़ा (2) टेक (3) अन्तरा (4) पूरक पंक्ति (5) तुकान्तता (6) लयात्मकता) और दो शिल्पेतर लक्षण हैं-(1) भावप्रवणता (2) लालित्य।  उदाहरण--- *आधार छंद-- पुंडरीक* *विधा-- गीत* *वर्ग का नाम- अवतारी* *वर्गभेद- 75,025* *परिचय- सममात्रिक, मापनीमुक्त नवप्रस्तारित छंद* *मात्रा- 24* *यति- 16,8* पदांत- दो गुरु अनिवार्य (122) सादर अवलोकनार्थ--- कौन कहाँ कब सफल हुआ है, स्वयं विचारो। अपने  भीतर की क्षमता को, आज  निहारो।। परनिंदा   से   बचो  हमेशा, करो   प्रशंसा। नीर क्षीर का परम विवेकी, बन जा हंसा।। धर्मनिष्ठ  हो  जीवन पथ पर, रूप  निखारो। अपने भीतर की क्षमता को, आज निहारो।। लक्ष्यवान बन आगे बढ़ना,  भाग्य  बनाओ। सीखो सद्गुण उर्जित होना, पाँव बढ़ाओ।। एक नई शुरुआत करो  अब, सभी बिसारो। अपने  भीतर की क्ष...