जंग और दिल्लगी
यहाँ जीना भले भारी बहुत है,
मगर यह ज़िंदगी प्यारी बहुत है
निभाए कौन बोलो साथ तेरा
हर सू कालाबाजारी बहुत है
उसी रस्ते पर अब तुम जा रहे क्यों,
कहे फिरते थे व्यापारी बहुत है
दिए बिन जह्र मारती ज़िंदगी है
तभी देती है बीमारी बहुत है
हो जारी जंग या फिर दिललगी हो,
जगह हर मारामारी बहुत है
सूरज तिवारी
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