ग़ज़ल
ग़ज़ल
वे बेझिझक ही सभी का जवाब लिखने लगे
हुए बड़े तो सबका हिसाब लिखने लगे
गुनाह कोई भी छोटा बड़ा नहीं होता
ये सोच हम्म भी पुख़्ता किताब लिखने लगे
चराग़ घर का तो सरहद पे हो गया कुर्बां
करे जो जुर्म उनको खराब लिखने लगे
उबाल आए जो खूं में तभी सही रहता
नदी के पाक से जल को शराब लिखने लगे
फ़िज़ूल खर्च तो छोड़ो सुनो ऐ सूरज तुम
अज़ीज़ तेरे तुझे अब नवाब लिखने लगे
सूरज तिवारी
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