ग़ज़ल
फ़िज़ूल का मेरे घर खर्च देख जान रहे
नहीं रखे है कमाई पिता जी मान रहे
कभी न रूठ के भगवान द्वार से जाए
ये सोच कर के पिता मुफलिसों दे दान रहे
खुदा वतन के लिए बस ईमान हो उर में
बुजुर्ग की है विरासत हमें ये ध्यान रहे
सभी हैं चाहते बस तख्त वो ताज दुनिया में
बने फकीर हो तुम क्यों ये हम भी जान रहे
शिकार कर ने चलें शेर खाल पहने हुए
यहां परिंदे सभी अब गगन को छान रहे
सूरज तिवारी
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