ग़ज़ल
समाज के प्रपंचों में जली है,
अहिल्या प्राण अर्पण कर चली है।
हमारे बाद पूजेगी ये दुनिया,
अवध के वासियों, सीता भली है।
लगा है चोट रघुवर को जहान में,
ये बातें पत्थरों को भी खली हैं।
बना है प्रेम-निर्मित पुल जहाँ में,
मिटेंगे धूल में, रावण में खलबली है।
किया अत्याचार तो ये देख लेना,
यहाँ रावण की नगरी भी ढली है।
सूरज तिवारी
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