ग़ज़ल

शिकारी को समझ अब खग गए हैं, 

बिछा जब जाल देखा भग गए हैं।


बहन ने भाइयों से राज खोला,

घरों में आज दीमक लग गए हैं।


जुदा हो बाँह से मिलता नहीं कुछ,

 विभीषण जीत कर भी ठग गए हैं।  


सूरज तिवारी

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