गीत
राम को देखकर मुस्कुराती रही।
जानकी वाटिका में लजाती रही।
मानती थी जिन्हें प्रेम का देवता ,
जानकी फूल उनको चढ़ाती रही।
राम भाए नजर बस चुराती रही,
जानकी ख़्वाब मन में सजाती रही।
हो धनुष भंग बस राम के हाथ से,
वह महादेव से हित मनाती रही।
चाहती थी जिन्हें पास अपने सदा,
पा लिया राम वर मुस्कुराती रही ।
छोड़ महलों भरा सुख वनों में रही,
राम का साथ हर पल निभाती रही।
मीत कैसे भूला दे तुम्हें इस तरह,
राम के इस हृदय में समाती रही ।
सूरज तिवारी
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