ग़ज़ल

 ग़ज़ल 


उर्मिला रो रही लखन के प्यार में,

रोज़ बैठे बिछा नयन इंतजार में। 


 रोज करती दुआएं वो रब से यही, 

रब दुबारा न आऊं मैं संसार में। 


 दिल में चाहत लिए जागती रात भर 

कट रही उम्र उसकी अब ख़ार में। 


 प्रीति की रीत होती अनोखी बड़ी, 

लुत्फ़ आता बहुत है यहाँ हार में। 


नींद आंखों की मेरी उड़ी आजकल, 

दिल करे कूद जाऊॅं मैं अंगार में।


सूरज तिवारी

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