Posts

ग़ज़ल

 उसे दिखता तिरा ही अक़्श तेरी हर निशानी में इसी से ज़िक्र करती श्याम का राधा कहानी में// जरूरत है कि बदले हम बुरी आदत को अब अपनी  ख़ताएँ हो ही जाती है सभी से अक्सर जवानी में// बढ़ाकर फासले तुमने किया आधा मुझे मोहन , तभी होती विकल है राधिका प्यारी नादानी में // सजे महफिल फ़लक पर रोज चंदा और तारों की  मगर यह देखता इंसान कब बोलो जवानी में//  तेरे किरदार से वाकिफ़ ज़माना हो चुका है  वहम लेकिन दिखाई दे रहा तेरी जुबानी में// लगाकर टकटकी देखे ज़मीॅं को जब कभी सूरज  नज़ारा खूबसूरत देखता दरिया के पानी में// सूरज तिवारी 

ग़ज़ल

बाप के हरिक विरासत को बढ़ाऊं कैसे छोड़ के घर शहर को आज मैं जाऊं कैसे खाक होते हुए दिखा आज जो जिंदा दिल था शख़्स तो शेर था इसको यूं जगाऊं कैसे  जब अदालत में बिके न्याय खुलेआम यहाँ फिर मैं कातिल को सज़ा आज दिलाऊँ कैसे   खौफ़ बेतरह बढ़ा तीरगी का अब देखो मैं दिया रोज न आखिर मैं जलाऊँ कैसे झूठ करता है जो बे आब हमेशा सच को रूह में में आग लगी है ये बुझाऊं कैसे  सूरज तिवारी

ग़ज़ल

 दिल में अब आरजू जगाया कर ग़म मिलें फिर भी मुस्कुराया कर लाल इतनी हुई है क्यों ऑंखें अश्क़ चश्मे से तू छिपाया कर कैद कर प्रेमियों के जोड़े को ऐ सितमगर सितम न ढाया कर भेद देने से जल गई लंका  भेदियों से बसर बचाया कर देन मॉं बाप की विरासत है बेच  कर दाग मत लगाया कर सूरज तिवारी

ग़ज़ल

 जुगनू प्रश्न उठाते थे झूठी कसमें खाते थे सूरज है नादान बड़ा  तुम जग को बतलाते थे  ग़म के काले साये में  यू मुझे ग्रहण लगाते थे चाँद सितारों की कसमें  प्रेमी नहीं निभाते थे  सूरज पर प्रश्न उठाकर  घर को रोशन करते थे  सूरज तिवारी

ग़ज़ल

जिंदगी तुझ बिन कहां आसान है रास्ते बिल्कुल सभी अंजान है मैं विरह की अग्नि में जलती रही  सहचरी हूं तब तो मिलता मान है प्राण से अब ले विदा जाने लगी राम के पद चिन्ह का बस ध्यान है छोड़ कर अब राम को तुम जा रही  राम को तुमने कहा था प्राण है   राम के आंसू कभी रुकते नहीं अग्नि में सीता जले सम्मान है  ये जगत सबको विरह देता सदा प्रेमियों को जग कहे नादान है दो घड़ी की जिंदगी में रो के गए कष्ट रघुवर ने सहा भगवान है सूरज तिवारी

Gazal

 कुछ लोग जी रहे है सहारे बगैर भी  हमने कमा लिया है इशारे बगैर भी   तस्वीर एक जिसमें मैं शामिल नहीं कभी सम्मान दे रहे वो तुम्हारे बगैर भी  प्रिए दिल निकाल हाथ पे रख दे फटाक से  क्या चाहते हैं और हमारे बगैर भी संघर्ष के घड़ी में अकेले थे ऐ खुदा  कुछ लोग हार जाते है हारे बगैर भी घुटनों में अब पड़े यू गुलामों की ही तरह  उसने लिया गुलाब न पुकारे बगैर भी  सूरज तिवारी

Gazal(जली लंका सबको खबर है)

 जली है लंका सबको ख़बर है सिया के राम मुस्काते मगर है हृदय में पीर गहरी देखो हनुमत   चलें किस पथ पे प्रभु मुश्किल डगर है सुनाओ कुछ व्यथा अब जानकी की अधूरा प्रेम पाने का सबर है  चरण में अब पड़े हनुमान बोले समंदर पार प्रभु रावण का घर है हे रघुवर तीर तरकश से निकालो  लिखा इतिहास युग युग तक अमर है सूरज तिवारी