ग़ज़ल
उसे दिखता तिरा ही अक़्श तेरी हर निशानी में इसी से ज़िक्र करती श्याम का राधा कहानी में// जरूरत है कि बदले हम बुरी आदत को अब अपनी ख़ताएँ हो ही जाती है सभी से अक्सर जवानी में// बढ़ाकर फासले तुमने किया आधा मुझे मोहन , तभी होती विकल है राधिका प्यारी नादानी में // सजे महफिल फ़लक पर रोज चंदा और तारों की मगर यह देखता इंसान कब बोलो जवानी में// तेरे किरदार से वाकिफ़ ज़माना हो चुका है वहम लेकिन दिखाई दे रहा तेरी जुबानी में// लगाकर टकटकी देखे ज़मीॅं को जब कभी सूरज नज़ारा खूबसूरत देखता दरिया के पानी में// सूरज तिवारी