ग़ज़ल

जिंदगी तुझ बिन कहां आसान है
रास्ते बिल्कुल सभी अंजान है

मैं विरह की अग्नि में जलती रही
 सहचरी हूं तब तो मिलता मान है

प्राण से अब ले विदा जाने लगी
राम के पद चिन्ह का बस ध्यान है

छोड़ कर अब राम को तुम जा रही 
राम को तुमने कहा था प्राण है  

राम के आंसू कभी रुकते नहीं
अग्नि में सीता जले सम्मान है 

ये जगत सबको विरह देता सदा
प्रेमियों को जग कहे नादान है

दो घड़ी की जिंदगी में रो के गए
कष्ट रघुवर ने सहा भगवान है

सूरज तिवारी

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