ग़ज़ल
बाप के हरिक विरासत को बढ़ाऊं कैसे
छोड़ के घर शहर को आज मैं जाऊं कैसे
खाक होते हुए दिखा आज जो जिंदा दिल था
शख़्स तो शेर था इसको यूं जगाऊं कैसे
जब अदालत में बिके न्याय खुलेआम यहाँ
फिर मैं कातिल को सज़ा आज दिलाऊँ कैसे
खौफ़ बेतरह बढ़ा तीरगी का अब देखो
मैं दिया रोज न आखिर मैं जलाऊँ कैसे
झूठ करता है जो बे आब हमेशा सच को
रूह में में आग लगी है ये बुझाऊं कैसे
सूरज तिवारी
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