55.किरीट सवैया 211*8 (गाव बसे उर में अब )
गांव बसे उर में अब छोड़ नहीं सकते तुमको प्रिय लाकर।
हाथ छुड़ा कर जा सकती अब ध्यान करो कसमें वह खा कर।
जी न लगे परदेश कही हम जी न सके निज गांव भुलाकर।
प्यार भरा अब जीवन है सब कष्ट मिटा तुम को अब पाकर।
Suraj Tiwari
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