कविता
कविता
धनुष को भंग कर भाते मिले है
सिया के संग प्रभु आते मिले है
अयोध्या में सभी उत्सव मनाते
खड़ाऊ अब भरत लाते मिले है
मिला कब प्रेम रघुवर को जहां में
सिया का पीर हम गाते मिले है
हमारे राम निर्माता जगत के
जगत के चोट को खाते मिले है
दिया आदेश तो लंका जली है
किया कुछ भी न समझाते मिले है
बड़ा है नाम राघव का जगत में
बुराई खत्म कर जाते मिले है
मुसाफिर जिंदगी से तुम न थकना
जहां में राम मुस्काते मिले है
सूरज तिवारी
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