ग़ज़ल
ग़ज़ल
जिस के लिए खड़ा हूं मैं सागर लिए हुए
मेरी तलाश करता है खंजर लिए हुए
तूफान ए ज़ुल्म व जौर से टकरा गया हूं मैं
होठों पे तिशनगी का समुन्दर लिए हुए
अहले खिरद ज़माना जिसे कह रहा है आज
वो ही खड़ा है हाथ में पत्थर लिए हुए
जिसका वजूद कुछ नहीं नजरों के सामने
पत्थर की शक्ल में हैं वो गौहर लिए हुए
अय बादशाहो तुम ये सबक भूलते हो क्यों
दुनिया से क्या गया है सिकंदर लिए हुए
सूरज तिवारी
Comments
Post a Comment