ग़ज़ल
ग़ज़ल
वक्त के साथ जो भी चलते हैं
अपने हालात को बदलते हैं
अपने घर से वो जब निकलते हैं
अहले दिल अपना हाथ मलते हैं
कामयाबी कदम न चूमे क्यों
ठोकरें खा के जो संभलते हैं
उनको भी कामयाब कर मौला
जो मुझे देख करके जलते हैं
जब से रोशन हुआ हैं ये सूरज
कितनी नजरों को आज खलते हैं
सूरज तिवारी
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