ग़ज़ल

 ग़ज़ल 


कुछ इस तरह से खुद को सॅंवारा कभी कभी

यादों में तेरे खुद को निखारा कभी कभी


खुशियों के फूल खिल गए वीरान चमन में

उसने किया हमें जो इशारा कभी कभी 


खा कर भी चोट खुद ही सॅंभलना पड़े यहॉं

मुश्किल  से कोई देता सहारा कभी कभी


करते हैं जॉं निछावर हम पर कई मगर

हमने तो बस तुझे ही पुकारा कभी कभी


इकरार हो न हो कोई ग़म अब हमें

नज़रें उठा के देख तो यारा कभी कभी


सूरज तिवारी

@highlight

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