दोहा :- नियम एवं व्याख्या

 #दोहा :- नियम एवं व्याख्या
               

दोहा मात्रिक अर्द्धसम छंद है। दोहे के चार चरण होते हैं। इसके विषम चरणों (प्रथम तथा तृतीय) में 13-13 मात्राएँ और सम चरणों (द्वितीय तथा चतुर्थ) में 11-11 मात्राएँ होती हैं ।
 विषम चरणों के आदि में जगण (।ऽ।) नहीं होना चाहिए। सम चरणों के अन्त में एक गुरु और एक लघु मात्रा का होना आवश्यक होता है अर्थात अन्त में लघु होता है।
आसान भाषा में....
दोहा किसे कहते हैं ?
- काव्य का एक छंद जो कि मात्राओं पर आधारित होने के कारण मात्रिक छंद कहा जाता है।  इसे दो पंक्तियों में लिखा जाता है और प्रत्येक पंक्ति के दो भाग होते हैं जिसे चरण कहते हैं। एक दोहे में चार चरण होते हैं। प्रत्येक चरण के बाद विराम होता है। विराम यानि रूकना। विराम को दर्शाने के लिए अल्पविराम ( , ) का चिह्न होता है। दूसरे और चौथे चरण का तुकांत होता है।  
 जैसे :-
ऐसी  बाणी   बोलिये,  मन  का  आपा   खोइ
अपना तन  सीतल   करै, औरन  कौं सुख होइ।।

ऐसी  बाणी   बोलिये      - एक चरण     (इसमें 13 मात्राएँ होती हैं) चरण के अंत में दीर्घ वर्ण होता है
मन  का  आपा खोइ      - दूसरा चरण    (इसमें 11 मात्राएँ होती हैं) चरण के अंत मे लघु वर्ण होता है
अपना तन  सीतल   करै  - तीसरा चरण   (इसमें 13 मात्राएँ होती हैं) चरण के अंत में दीर्घ वर्ण होता है
औरन  कौं सुख होइ      - चौथा चरण     (इसमें 11 मात्राएँ होती हैं) चरण के अंत मे लघु वर्ण होता है

एक और उदाहरण देखिये
बड़ा हुआ तो क्या हुआ , जैसे पेड़ खजूर
12  12   2  2   1 2 ,  22  21  121
     (13)                         (11)
पंथी को छाया नहीं , फल लागे अति दूर
22  2  2 2    12 , 11  22  11  21
     (13)                        (11)

साहित्य उपवन 

आदर्श सिंह निखिल महक छाबड़ा चन्दा सोनी रानी सोनी'परी' Rakhi Singh Faujdar Saroj Saudamini मृत्युञ्जय देव शुक्ल M Muskaan पुनीत पांचाल कोमल 'वाणी'

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