51.काव्य दोष 2

 5- दुष्क्रमत्व दोष

जब कोई ऐसी बात कही जाती है जो लोक या शास्त्र के विरुद्ध हो तो दुष्क्रमत्व दोष होता है।

उदाहरण - 

मुख मयंक को देखकर विकसा मानस कंज।


कमल चंद्रमा को देखकर तो खिलता नहीं है इसलिए ये दोष है


होना चाहिए था


सूरज का मुख देखकर विकसा मानस कंज



ये बात लोक विरुद्ध ही है न कि चंद्रमा को देखकर कमल खिला



हां कुमुदिनी की बात होती तो सही था

कुमुदिनी के पर्याय


नलिनी, कैरव, चंद्रप्रिया, कमलिनी, छोटा कमल, अरविंदिनी, मृणालिनी, तामरसी, विधुप्रिया, तमरसी ये भी कुमुदिनी के पर्याय


क्योंकि कुमुदिनी रात्रि में खिलती।



6- अपुष्टार्थत्व दोष::

जहाँ किसी ऐसी वस्तु का वर्णन हो जिसके न होने पर भी इच्छित अर्थ की प्राप्ति में बाधा न हो, तो पुष्टार्थत्व दोष होता है।

उदाहरण - 

आये वैरी विपुल चढ़ के अब उठो सैनिकों तुम।


वैरी विपुल न भी हों तब भी सैनिकों को उनका सामना करने को उठना ही होगा।यहाँ विपुल का प्रयोग अनावश्यक है।


7- व्रीडावाची दोष....


लज्जा या संकोच का भाव जगाने वाले शब्दों को व्रीडावाची शब्द कहते हैं।


उदाहरण - 

घटाएं पुरानी  मौन,

बैठा सोचता हूँ

उस समय

कितना बड़ा मैं चूतिया था।

       

चूतिया शब्द... व्रीडावाची शब्द है।इसलिए यहाँ यह दोष ।


8- ग्राम्यत्व दोष - 

काव्य में जहाँ ग्रामीण शब्दों का प्रयोग किया गया हो वहाँ ग्राम्यत्व दोष होता है। 

उदाहरण -

आप इस दुआर पर कभी मत आना।

    इसमें दुआर ग्रामीण शब्द है,इसलिए यहाँ ग्राम्यत्व दोष है।



9- क्लिष्टत्व दोष

जहां तुरंत अर्थ समझने में कठिनाई हो वहां क्लिष्टत्व दोष होता है।


उदाहरण - 

नखत बेद ग्रह जोरि अरधकरि को बरजै हम खात

(27 नक्षत्र,4 वेद 9 ग्रह जोड़ कर आधा करे यानी 40 का आधा 20  ,,,,विष) 


नखत बेद ग्रह जोरि अरधकरि (नक्षत्र 27+वेद 4+ग्रह 9=40,,40,भाग 2=20 बीस से खींचतान कर  बिस बनाया गया जिससे अर्थ हुआ विष?


खगपति-पति-पितृ-बधू-जल समान तुव बैन।

गरुड़ के स्वामी विष्णु की पत्नी लक्ष्मी के पिता समुद्र की पत्नी अर्थात गंगा कर जल के समान पवित्र तुम्हारे वचन।

    यहां क्लिष्टत्व दोष है।इस दोष का एक उदाहरण केशव की रामचंद्रिका भी है।तुलसी की रामचरित मानस की प्रतिस्पर्धा में केशव ने रामचन्द्रिका की रचना की,जो विद्वता और गुस्से के कारण बहुत क्लिष्ट हो गईं।जिससे उन्हें कठिन काव्य का प्रेत कहा जाने लगा।



10- अमंगल वाची दोष...


अमांगलिक अर्थ को प्रकट करने वाले शब्दों से अमांगलिक दोष होता है।

श्री जमुनाजल पान कर बसु वृन्दावन धाम।

मुख में महाप्रसादु रखु, लै श्रीवल्लभ नाम।

भारतेंदु हरिश्चंद्र


यहाँ महाप्रसादु का अर्थ कृष्ण प्रसाद से है किंतु महाप्रसाद नर प्रसाद(नर मांस) को भी कहते। इसलिए अमंगल वाची दोष है।

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