46 सवैया छंद

 सवैया छंद

~~~~~~~~~~~~

मात्रा भार 

~~~~~~~~~~~~


मात्रा भार के बारे में आप सभी को ज्ञात ही है 

लघु वर्ण 1

गुरु वर्ण 2


मित्रो वर्ण और अक्षर में क्या अंतर है?

अक्षर वह है जिसका क्षरण न हो सके। 


स्वर से मिल कर ही कोई अक्षर वर्ण बनता है

क् +अ = क भार १

क् + आ= आ भार २


इसलिए जब किसी वर्ण के नीचे हलंत लगा होता है तो उसका भार आधा ही माना जाता है।


कमल १११

कमला ११२

कमाल १२१

कामिल २११

कामिनी २१२

अर्थात 

अ इ उ ऋ ये लघु स्वर हैं और इनसे संयुक्त वर्णों का भार भी १ होता है

आ ई ऊ ए ऐ ओ औ ये दीर्घ अर्थात गुरु वर्ण हैं और इनसे संयुक्त वर्णों का भार २ होता है

लेकिन ए और ओ कभी कभी उच्चारण के आधार पर अपवाद स्वरूप १ पर  भी लिये जाते हैं लेकिन स्थानीय बोलियों में ही 


जैसे -नाथ शंभु धनु भंजनि हारा

होइहि कोउ एक दास तुम्हारा

२११   ११   ११   ११  १२२


लेकिन खड़ी की रचनाओं बोली में इससे बचियेगा


अब बात हलंत वाले अक्षरों की

अर्थात आधे वर्ण की

यह अगर किसी शब्द में सब से पहले होता है तो इसका कोई भार नहीं होता। 

जैसे- प्यार २१ श्वेत २१ श्वान २१ स्वराज १२१

लेकिन अगर यह बीच में कहीँ है और बोलते समय इसका पर्याप्त भार इसके पहले वाले वर्ण पर पडे तो यह लघु वर्ण को दीर्घ कर देता है। किंतु यदि इसके पहले का वर्ण स्वयं दीर्घ है तो उसका भार २ ही रहेगा

सिद्धी २२ द् का भार सि पर जाएगा

सिद्धि जो कि सही शब्द है २१ 

गिद्ध २१ 

महत् २१ 

पूर्ण २१

पूर्व २१

महत्वपूर्ण १२१२२

अगर किसी शब्द के अंत में हलन्त है तो उसका भार भी उसके पहले के वर्ण पर आएगा 

महत् १२

सत् २

स्वयम् १२

किन्तु अपवाद स्वरूप अगर हलन्त वाले अक्षर का भार बोलते समय अपने आगे के वर्ण पर नहीं पड़ता तो उसका कोई भार नहीं होता

जैसे - तुम्हारे १२२  कुल्हाड़ी १२२


चन्द्र बिन्दु  ँ  अर्थात अनुनासिक का कोई भार नहीं होता। 


जब कि अनुस्वार अर्थात ं का भार होता है

अनेक लोग चन्द्र बिंदु के स्थान पर अनुस्वार का प्रयोग करते हैं जो अनुचित है चांद नहीं चाँद सही शब्द है


न् म् और ञ् के स्थान पर भी शिरोरेखा के ऊपर बिन्दु का प्रयोग किया जाता है 


यथा - 

हिन्दू / हिंदू २२

बिन्दु / बिंदु २१


हिन्दी वर्णमाला का सत्ताईसवाँ व्यंजन र वर्ण जिसका उच्चारण जीभ के अगले भाग को मूर्धा के साथ कुछ स्पर्श कराने से होता है  यह स्पर्श वर्ण और ऊष्म वर्ण के मध्य का वर्ण है  इसका उच्चारण स्वर और व्यंजन का मध्यवर्ती है; इसलिये इसे अंतस्थ वर्ण कहते हैं


पहला


रेफ (र्) जिसको  किसी वर्ण के ऊपर लगाया जाता है, और जिस वर्ण पर लगता है उस वर्ण को पूर्ण और रेफ को अर्ध उच्चारित करते हैं। रेफ को पहले और जिस पर रेफ लगा है उसको बाद में उच्चारित करते हैं। जैसे - कर्म, २१  धर्म  २१ सूर्य भी २१


दूसरा 


रडार (र) इस र को अक्षर के नीचे लगाया जाता है और यह पूर्ण र होता है तथा जिस अक्षर पर लगाया जाता है वह अर्ध उच्चारित होता है। जिस अक्षर पर रडार लगा होता है उस अक्षर को पहले तथा रडार को बाद मे बोलते है। जैसे - क्रम, भ्रम 

क्रम भ्रम ११

भ्रमण १११


तीसरा 


पदेन (र) इस र को अक्षर के पद अर्थात सबसे नीचे लगाया जाता है, पदेन को भी पूर्ण र उच्चारित किया जाता है और जिस अक्षर पर लगा होता है उस अक्षर को अर्ध और पहले उच्चारित किया जाता है। जैसे - ट्रक, ड्रम आदि 

इनका भार भी ११ है

चौथा स्वरूप पूर्ण र जिसे लुंठित कहते हैं जैसे रमन १११ राम २१ रावण २११


र और ऋ अलग अलग हैं भ्रमर में र है तो मृणाल में ऋ है ध्यान रखें इन दोनों के ग़लत प्रयोग से शब्दों के अर्थ बदल जाते हैं। 

ग्रह - सूर्य, चन्द्र पृथ्वी आदि आकाश निवासी 

गृह - घर मकान निवास


म्रत नहीं मृत सही शब्द है 

प्रथम सही

प्रथक ग़लत पृथक सही


गति और यति के बारे में एक प्रश्न आया था

गति का अर्थ है प्रवाह और यति का अर्थ है विराम

जैसे दोहे में १३ और ११ मात्रा पर यति होती है- यथा


झंझावातों में हँसे, आँधी को ले जीत। 

धारा से उल्टी बहे, जग में सच्ची प्रीत।।


 हँसे तक गति फिर अल्प विराम अर्थात कूछ देर रुकना है तो यहाँ यति है।  फिर जीत के बाद पूर्ण विराम पर यति है


किन्तु यदि जहाँ यति है वहाँ कोई शब्द टूट रहा है अर्थात आधा यति के पहले और आधा यति के पश्चात आ रहा है तो इसे यति दोष माना जाता है।


आज के नोट्स 


सामान्यतः पद्य को ही काव्य समझा जाता है किंतु काव्य के तीन भेद हैं--

1-गद्य

2-पद्य

3- चम्पू(मिश्रित काव्य)

      तुलसी बाबा का पद्यात्मक रामचरित मानस,मैथिलीशरण का जयद्रथ बध  काव्य हैं तो श्री वियोगी हरि का गद्यात्मक तरंगिणी या अंतर्नाद भी काव्य हैं।वास्तव में कविता के विशिष्ट गुणों से युक्त कथन को चाहे वह गद्य में हो या पद्य में काव्य कहना अधिक उपयुक्त होगा।कुछ रचनाएँ ऐसी होती हैं जो गद्य और पद्य दोनों में होती हैं,उन्हें मिश्रित काव्य या चम्पू कहते हैं।जैसे....अनूप शर्मा की कृति--फेरि मिलिबो।

पद्य काव्य के अन्तर्गत दो तरह का काव्य आता है---

1-मुक्तक काव्य

2--प्रबंध काव्य


हम लोग छन्द,गीत आदि जो भी रचनाएँ लिखते हैं वो सभी मुक्तक काव्य ही हैं ।आप ऐसा भी समझ सकते आज तक आपने जो भी लिखा वो मुक्तक काव्य के अंतर्गत ही आएगा यानी फुटकर रचना

पूरी किताब में जब एक ही कविता होती तो वो खण्ड काव्य या महाकाव्य होगा कई हैं तो मुक्तक काव्य ।

खण्डकाव्य---मानव जीवन के किसी अंश का वर्णन।जैसे मैथिलीशरण गुप्त का पंचवटी।हर सर्ग में अलग अलग छँद प्रयोग किये जाने आवश्यक नहीं किंतु छन्द का होना जरूरी।


खण्ड काव्य में पाँच सर्ग होना जरुरी मतलब पाँच अध्याय

हर सर्ग में अलग छंद

किसी व्यक्ति के जीवन पर आधारित होता है खण्ड काव्य

महाकाव्य..महाकाव्य किसी नायक के सम्पूर्ण जीवन पर आधारित होता है।सर्गों में बंटी रचना।एक या अधिक नायक।प्रधान रस श्रृंगार वीर या शांत, अन्य रस भी होते।धर्म अर्थ काम मोक्ष में कोई एक फल होता।आठ सर्ग।हर सर्ग का अलग छँद होता किन्तु प्रत्येक सर्ग का अंतिम छँद उससे भिन्न होता।कहीं कहीं एक सर्ग में अनेक छन्द प्रयोग किये जाते।

Comments

Popular posts from this blog

जिंदगी की सियासत

ग़ज़ल

ग़ज़ल