31.रात खामोश है

 

रात है खामोश गहरी ज़िन्दगी है मान लो
शांत एक दीवार की टागी घड़ी मै मान लो

नीद से उठकर गुजरते वक्त जो देखा घड़ी
सब मुसीबत अब गले पडने लगी है मान लो

ख़ाक में तब्दील हो मै जाऊंगा जो कहाॅ
कब्र पर आए मिरें वो बस कमी है मान लो 

©️Suraj Tiwar

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