जिंदगी की सियासत यहां राजा के दरबारी बहुत है मरें क्यों जिंदगी प्यारी बहुत है जहां में साथ कोई भी न देगा यहां पर काला बाजारी बहुत है कमाते फिर रहे हो चंद रुपए कभी हँसते थे व्यापारी बहुत है दगा देती सभी को जिंदगी है सनम मुझको भी बीमारी बहुत है यहां तो जंग के मैदान में भी अभी देखो वफादारी बहुत है सूरज तिवारी
Comments
Post a Comment